Independent Poem 2 : Manya

डोरियाँ बहुत हैं
लम्हें उलझाने को
मन्ज़र बहुत हैं
टूट कर बिखर जाने को
संवरने के मौके कई
मिलते हैं राहों में
कुछ झपट कर बादशाह बन जाते हैं
बाकी फूटी किस्मत समझ आहें भरते रह जाते हैं।
क़ाफ़िले तो यूँ ही
निकल पड़ते हैं किनारों पर 
कोई जकड़े कैदी
तो कोई आज़ाद पंछी कहलाते है
सूरत से नहीं
फ़र्क सीरत से नज़र आते हैं
जब कुछ इसां समंदर में तैर मोती खोज लाते हैं
बाकी डूब दरिया में मिल जाते हैं।

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