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Response Poem 2 - Kumar Abhimanyu

In response to Agha Shahid Ali's 'Cremation'. Your bones refused to burn when we set fire to flesh. who would have guessed you'd be stubborn in death. But not enough to come back lying there making fun of us, I guess. We had to break your skull with sticks while crying, asking you to come back. maybe we were stubborn too... No. Fools! Fools. That we were! You, me. All of us.

villanelle - Kumar Abhimanyu

हो बिन कहे, ठेहरा तू हर मोड़ पर हो यारा मेरे लिए भूला तू खुद की डगर ओ यारा मेरे लिए हर कदम संग चली तेरी ही यारी इस बेढंगी दुनिया के संगी हम ना होते यारा अपनी तो यारी अतरंगी है रे कर बेरंगी शामें हुड़दंगी मस्त-मलंगी यारा अपनी तो यारी अतरंगी है रे                         - दीपक रमोला, गुरप्रीत सैनी ('वजीर' फिल्म का गीत ) रामजस वाले दोस्तों कि याद में ... तेरी याद आए है मुझे मैं बुलाऊँ तू न आए, तू बुलाए मैं न आऊँ अपनी तो यारी अतरंगी है रे तू अलग शेहेर में, मैं उसी शेहेर में तू जल्दी आजा, और कितना बुलाऊँ तेरी याद आए है मुझे रात दो बजे हैं, सोने दे ओ भाई रे "अबे चल न गाडी निकाल, मैं जॉइंट जलाऊं" अपनी तो यारी अतरंगी है रे बहुत दिन हो गए रामजस गए तू जल्दी आजा, तेरे साथ चलूँ तेरी याद आये है मुझे लोटन के छोले-कुलचे याद हैं तुझे? आ छित्तर मार के याद दिलाऊँ अपनी तो यारी अतरंगी है रे और क्या है, तू तो जानता है रे काके छड के न जाईं मैनु तेरी याद आए है मुझे अपनी तो यारी अतरंगी है रे    

City Poem - Kumar Abhimanyu

"वह इलाका क्रूर है वहाँ मत जाना" "बचाओ" "बचाओ" "बचाओ" मैं कभी नहीं गया उधरपर गुज़रा हूँ कई बारअब तुम हो उधर और तुम्हारे मेरे बीच ये दूरी है तुम्हारी ये चुप्पी क्रूर है और हो न हो मैं जानता हूँ वह इलाका क्रूर है 

Response poem : Stationery : Kumar Abhimanyu

चाँद सूरज में तब्दील नही हुआ। वह बस उत्तर गया, रेगिस्तान पर फैली चादरों में, चाँदी की परतें जो बनाई थी तुम्हारे ही हाथों ने। अब ये रात तुम्हारी कारखाना है और दिन तुम्हारा बाज़ार खाली पन्नों से भरी हुई है ये दुनिया लिखना मुझे।

Ghazal : Kumar Abhimanyu

सुनो, तुमसे ज़रा सी बात कहनी थी वैसे तो बहुत सारी बात कहनी थी तुमने जाते वक्त क्यूँ कुछ न बोला कम-स-कम थोड़ी ही बात कहनी थी जो हुआ सो हुआ खैर छोडो, तुम बताओ क्या तुम्हें भी कोई बात कहनी थी? क्यूँ बके जा रहा हूँ आज ये सब जानता हूँ! ज़रा जल्दी बात कहनी थी फ़ोन पर तेरी आवाज़ की ताक़ रहती है मगर "हेलो ! airtel customer? आपसे ही बात कहनी थी" टिंडर पे हूँ आजकल, कोई है (?) जिसे मुझसे कभी कोई बात कहनी थी 'रफ़ि' ये ग़ज़ल सिर्फ कोर्स  के लिए लिखी या सच में उसे कोई बात कहनी थी 

Love Poem: Kumar Abhimanyu

प र्बत चोटियों पर हवाएँ चली आती हैं कभी-कभी, हलचल करती, बिनबुलाये, यूँ ही |  सुकून?... अब क्या बताएँ! जैसे आ जाती है कभी-कभी, तुम्हारी याद, बिनबुलाये, यूँ ही |