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Response Poem 4: Ganesh Gautam

Just a few returns from dust,  disguised as roses. --Not all,  only a few returns by Agha Shahid Ali सिर्फ कुछ ही लौटकर आते है उस मिट्टी से,  वो भी गुलाब बनकर -सब नहीं,  सिर्फ कुछ ही लौटते है अगाह शाहिद अली सिर्फ कुछ ही लौटकर आते है उस मिट्टी से, वो भी गुलाब बनकर जैसे तुम आये हो मैं कर रहा था शायद तुम्हारा ही इंतज़ार इतने समय से मैं मुरझा चुका था, धीरे-धीरे पत्तियों की तरह बिखर जाता और मिल जाता इस धरती में जहाँ तुम भी बसे थे क्या पता मिल जाते हमारे कुछ कण और बन जाते क्या कुछ या शायद न रहता याद किसी को कुछ भी मगर फिर खिल गया हूँ जब से तुम आये हो तुम ही तो जानम् इस बाग को महकाए हो। मैं ढूँढता रहता था तुम्हारा नाम-ओ-निशान इस धरती में उस अम्बर में हवाओं से बात किया करता था आंधियों से भी मुलाकात किया करता था बारिश जब भी आती मुझको झंझोड़ती मगर मैं तुम्हारी ही बात किया करता था अच्छा लगा कि तुम वापिस आए हो। अनहोनी को होनी के शब्दों में पिरोकर एक आशा रुपी माला को मैं जपा करता था शरीर जुदा होन...

Independent Poem 3: Ganesh Gautam

बातें जैसे कभी-कभी वजीराबाद के जाम में फसकर तुम्हारे साथ, थोड़ा ज्यादा समय बिता लिया करते थे अच्छा लगता था लेकिन इस "सिगनेचर ब्रिज" ने तो सब बातों पर पानी फेर दिया हैं बात शुरू ही हुई होती है कि विश्वविद्यालय आ जाता हैं

Independent Poem 2: Ganesh Gautam

ज़मीने गुनगुनाती हैं ज़मीने गुनगुनाती हैं जब तेज हवाओं की वो आंधियाँ आती हैं जब हर एक लाश में जान आ जाती हैं सारे बंधनों,  कानूनों को तोड़ने का जब जी चाहता हैं जब मन-मन में शंकाये कौंध जाती हैं और जब वो प्रतिरोध की सोच शब्दों में उतर आती हैं तब, ज़मीने गुनगुनाती हैं ज़मीनें गुनगुनाती हैं। ये हुंकार है उन दलितों की जो हमेशा मरते रहे जिनकी लाशों के अम्बार यूँ हमेशा बढ ़ ते रहे किस-किस के नाम गिनाऊँ मैं इतने है कि गिनते-गिनते खुद पागल हो जाऊं में रविदास और फुले कितना कुछ कर गए अंबेडकर और काशीराम हमें कितना ऊँचा कर गए मगर मेरी सांस तब घुटकर रह जाती हैं जब रोहिथ जैसी एक ओर हत्या हो जाती हैं तब,  ज़मीनें गुनगुनाती हैं ज़मीनें गुनगुनाती हैं। कितना न्यारा है मेरा ये हिंदुस्तान लाखों ने लुटाई है इस पर जान मगर कुछ जानों की शायद कोई कीमत नहीं होती हैं इसलिए उस किसान की अरथि पर उसकी फसल रोती हैं   बंजर ज़मीन में भी वो जान फूंक देता हैं पागल तो  नहीं,  क्यों उसको महबूब सा प्यार देता हैं शायद उसको हमारी जान की परवाह होती हैं लेकिन उसकी पर...

Individual Poem 1: Ganesh Gautam

गजल चलो तुम्हें कोई अनोखा पैगाम देता हूँ मैं तुम्हें मोहब्बत का एक जाम देता हूँँ मैं तुमसे मोहब्बत दिलों-जान से करता हूँ ये फरमान में जहां को सरेआम देता हूँ चाय और काफी का अलग ही मजा है दोस्तों मगर एक शाम शराब के भी नाम देता  दुनिया में दुखों की भरमार कुछ ज्यादा है चलो मैं 'मुस्कान' से भरी एक शाम देता हूँ तुम जो जिदंगी में इतने दर्द सहते हो न ठीक करने के वास्ते इश्क़ का बाम देता हूँ 'तहरीर' ये जिंदगी इश्क़ में ही लुटेगी ये सोचकर मैं गजल को अंजाम देता हूँ

Response Poem 3 : Ganesh Gautam

Memory (From Amherst to Kashmir) Translation याद            फै़ज अहमद फै़ज से निराशा भरे रेगिस्तान में,  मैं सरसराहट के साथ हूँ तुम्हारे आवाज़ की,  तुम्हारे होठों की मृगतृष्णा (मिराज),  जो अब हिलती सी नजर आती हैं। दूरियों की घास और धूल ने इस रेगिस्तान में तुम्हारे गुलाब़ खिलने दिए है।  मेरे पास से जो हवा गुजरती है तुम्हारे चुंबन का एहसास कराती है। वो सुलगाती है, धीरे-धीरे,  अपनी कस्तूरी खुशबू को। और कहीं दूर, बूंद-बूंद, क्षितिज से परे,  गिर रही है तुम्हारे उजले चेहरे की वो ओस। याद ने अपने हाथ ऐसे रखे समय के चेहरे पर, उसको छुआ इतने प्यार से कि हालांकि ये हमारे जुदा होने की सुबह है, मगर ऐसा लगता है अभी वो रात आई है, जो तुम्हें मेरी खाली बाहों में ले आई हैं।

Response Poem 2: Ganesh Gautam

A Monsoon Note on Old Age Translation एक मानसूनी लेख पुरानी उम्र पर यह पचास साल बाद है:  मैं अपने आप में बैठा हूँ,  लिपटा हुआ मानसून की उमस में,  मेरी त्वचा सिकड़ी हुई सी,  एक थका हुआ-सा व्यक्ति, जिसको मालूम है किसी के न होने का; खिड़की की सलाखें मेरे ऊपर जेल की छवि बनाती हैं; मैं तारों को फेंटता हूं, पुराने ताश की गड्डी की तरह; रात वापस पा लेती है वो बरसात का अनुभव। मैं ज्यादा दिखा देता हूं तुम्हारी तस्वीर,  साफ करते हुए मौत के पार की दुनिया।

Response poem 1 - Ganesh Gautam

बरसात का मौसम कश्मीर आता हैं बरसात का मौसम कभी पहाड़ों को लांघ कर कश्मीर नहीं आता हैं।  -समतल जगहों का मौसम अगाह शाहिद अली बरसात का मौसम कश्मीर आता हैं फर्क बस इतना है बाकि जगहों से कि बरसात वहाँ खून की होती हैं औलों की जगह पत्थर बरसते हैं कुछ खुश होते है तो कुछ रोते है कोई आवाज़ उठाता, कोई चुप रह जाता हैं। बरसात का मौसम कश्मीर आता हैं। यहाँ कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी, ज़ायके,  झूले और मोहब्बत की कहानी कश्मीर में नाव बहा करती है आशा की भूख है सुकून की, फिर भी खाना खाते हैं कश्मीर के लोग बस अमन चाहते हैं जन्नत,  फिर बसाने का खयाल आता हैं। बरसात का मौसम कश्मीर आता हैं। आग की तरह जलता तो खाक हो जाता मगर ये धीरे- धीरे आंंच पर जलता हैं कितने लोग मरे सूखे पत्ते जैसे झड़े हर बार इंसानियत यूँ ही दफन होती रही इन्हीं सिलसिलों में साल बीत जाता हैं मगर ये मंजर बदलता नज़र न आता हैं। बरसात का मौसम कश्मीर आता हैं। "अम्मा लखनऊ का जिक्र किया करती और बनारस की धुनों को बजाया करती " बनारस वो शमशान की भूमि जहाँ मोक्ष मिलता हैं कश्मीर स्वर्ग हो...

Villanelle- Ganesh

अगर तुम न होते तो कैसा होता क्या ये जिंदगी ओर हसीन न होती क्या ये दुनिया तब एक रोशन जहां होता मैं शायद अब तक यूँ जिंदा न होता तुम अगर मुझको यूँ मिली न होती अगर तुम न होते तो कैसा होता ख्वाबों में तुम आती जब भी मैं सोता मगर तुम बिन ख्वाबों में एक बेरूखी होती क्या ये दुनिया तब एक रोशन जहां होता मैं इतना मासूम की हर बात पर रोता फिर तुम आकर सभांलती उन आंसुओं के मोती अगर तुम न होते तो कैसा होता मैं अगर गुस्से में बौखलाया न होता तुम शायद मेरी बाहों में न होती क्या ये दुनिया तब एक रोशन जहां होता जब भी लिखकर कलम को घिस रहा होता हर शब्द-शब्द में सिर्फ तुम बस रही होती अगर तुम न होते तो कैसा होता क्या ये दुनिया तब एक रोशन जहां होता

Political Poem: Ganesh Gautam

हम चुप है इसका मतलब यह नहीं कि हम कुछ भी बोल नहीं सकते बोलने को इतना है कि तुम थक जाओगे सुनते-सुनते मगर तुम्हें फुरसत कहाँ अपनी जुमलेबाजी से जब देखो बहला देते हो अपने मन की बातों से जब कोई सवाल करता तुम मुद्दा दूसरा ले आते हो शायद कुछ पता नहीं तभी सवाल से घबराते हो जब तक शांत हैं हम तब तक तुम चिंता मत करो आने वाले तूफान की तुम जरा परवाह करो जरुरत पड़ने पर हम इतना चिल्ला सकते हैं तुम लोगों की कुर्सी दहाड़ में गिरा सकते हैं लड़ना हमें पसंद नहीं लेकिन हथियार उठाते हैं कलम-स्याही से उनका सीना छल्ली कर आते है ध्यान रखो हम सौ या दो सौ नहीं बहुत सारे है हमारे पास नफरत नहीं प्यार की बौछारें है तो भड़काओं, ललकारों, हमें जितना ललकार सकते हो क्योंकि अब इस लड़ाई में केवल तुम ही हार  सकते हो। 

City Poem- Ganesh Gautam

प्यार शहर का अभी करावल नगर और लोनी के बीच ज्यादा अच्छे संबंध नहीं है। करावल नगर ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया था सालों पहले, और डबल साइडेड रोड़ बनाकर इजहार किया था अपनी दोस्ती का, लेकिन लोनी तो ठहरी अपने मजे में चूर उसने कर दिया मना कहा ऐसी दोस्ती को हमने नहीं जीना, इस इनकार का इजहार उसकी गढ्डे वाली सड़के बड़े जोर-शोर से करती है और करावल नगर की सड़के आह भरती है यह सड़क दिल्ली और यू.पी. को साथ लाती हैं हो चांदनी चौक या पुरानी दिल्ली वहाँ दुकानें बंद हो जाए,  फैक्टरियाँ खत्म हो जाए अगर मजदूर लोग इस सड़क से काम करने न जाए यहाँ से ही 227 नं की बस, पूरी भर कर जाती है संभालना अपनी जेबें कि वो कट जाती हैं गुर्जर, दलित,  मुसलमान या हो पूरविया सब रहते है इस सड़क के किनारों पर यहाँ दिल्ली लोनी बन जाती हैं। ... सुना है कुछ दिन पहले लोनी मान गयी, करावल नगर की चाहत को लोनी पहचान गयी और अब करावल नगर से भी ज्यादा बड़ी सड़कों के साथ इजहार किया है हाँ उसने प्यार किया, प्यार किया, प्यार किया हैं। कुछ दिनों बाद इनके बीच  एक गहरा संबंध बन जाएगा जो सड़कों के माध्यम से पनपे...

Ghazal: Ganesh Gautam

बहुत दिनों से लगता है कि कोई मुझे बुलाता है मेरी तड़प में रह कर अपने को सुलगाता हैं। दिये सा जलना महबूब का काम है शायद बेदिल लोगों में भी एक आस जगाता हैं। प्रेम की बरखा का तो अलग मजा है यारों बंजर जमीं को भी गुलज़ार कर महकाता हैं। सितमगारों की इस दुनिया में बहुत जुल्म सहे फिर भी अपना दिल बगावत से न कतराता हैं। मोहब्बत भरी इस दुनिया में रुस्ना जरूरी है कि चाँद भी महीने में एक बार मुस्कुराता हैं। तितली के परों सा रंगीन होता है इश्क़ खुदाया, ये बूढ़े दिलों को भी जवां बनाता हैं। 'तहरीर' ये जिंदगी बहुत हसीन हो जाती है जब महबूब कोई बाँहों में चला आता हैं। तहरीर - My Pen Name 

Love Poem: Ganesh Gautam

इंतज़ार इंतज़ार करने की आदत नहीं है उन्हें, फिर भी मेरा इंतजार किया करते हैं। मोहब्बत का इजहार कभी किया नहीं लेकिन हकीकत मालूम है कि मोहब्बत बेशुमार करते हैं। शायद कोई लफ्ज़ ज़बां पर न आये अगर नाम देना चाहे इस रिश्ते को। क्योंकि यह एक प्राथना है जिसे हम जिया करते हैं इसके अनगिनत ज़ाम हम पिया करते हैं। कभी मीरा ने श्याम से,  तो कभी इमरोज ने अमृता से यह वही मोहब्बत है,  जिसे अब हम किया करते हैं।