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Independent poem - 3

 हां कमअकल हूँ , नम्बरों की इस  दूनिया में , गिनती आती  नहीं मुझे,पर अपनी हर याद का हिसाब - किताब  रखती हूँ, मोल - भाव का अ -ब -स नहीं पता मुझे, फिर भी  खरीदारी करती हूँ , हाँ मैं शायरी करती हूँ। दर्द को बेहिसाब लफ्जों में बयान करती हूँ , रोज़ मरती हूँ , रोज़ हिसाब करती हूँ,  मरती भावनाओ को जिवंत शब्द देकर , तालियां बटोरा करती हूँ , हाँ मैं शायरी करती हूँ। इतना आसान नहीं हैं ऐ सरकारी आदम , रोज़ी -रोटी की दौड़ -भाग नहीं , अपने दिल के मर्ज़ का इलाज़ करती हूँ , हाँ मैं शायरी करती हूँ। एक रोज़ तू भी करेगा पर देख सरकारें काम ना आएंगी , अपनी चीख़ , चिल्लाहट और घुटते दम के बीच तेरी कलम तुझे बुलाएगी , बस इसी डर , खौफ और पागलपन के इस चोले में  मैं अटका  करती हूँ , हाँ मैं शायरी करती हूँ।

Independent poem -1

Sometimes they say I'm way too expressive, Sometimes they say I'm expressive in passive, Sometimes they say I laugh too loud, Sometimes they don't even bother for my silent sobbing cloud, \Sometimes they tell me to be more in limitedness,  Sometimes they tell me to be in  limitless, Sometimes they remember to tell me the importance of marriage, Sometimes they forget to tell me the expectation of its carriage, Sometimes they hate the idea of love, Sometimes they love the idea of hate, Sometimes they want to bring the inner me, Sometimes they don't let me be, Sometimes they comment on what I wear, Sometimes they like the way they tear; They like the way they tear the independent things, I am you, You is We, And These sometimes are the blockages of the dependent norms of  the collective thinking which is struggling to be independent.

Response Poem 2 - Translation

एक ख्वाब दोपहरी सा, देखा मैंने, जब दिल्ली पे दी, दस्तक मैंने - आगा शाहिद अली  I Dream It Is Afternoon When I Return to Delhi - Agha Shahid Ali मैं इंतज़ार कर रहा हूँ, खड़ा हूँ अकेला, पुराना किला। दरियागंज की बस के लिए  संभला , मैं निकला, देखा जब  मेरा हाथ तो  खाली  ही निकला। "कूदो,कूदो ,"कोई चिलाया , सालो से कुछ बचाया है मेरे लिए ये सुनाया, चांदी के सिक्को से भरा एक हाथ दिखाया। "कूदो,कूदो।"फिर कोई बौराया कोई नहीं था जाननेवाला मेरा ये बतलाया। एक पोलिसवाला , हाथ में चांदी की हथकड़ी लिए, मुझसे टिकट चेक कराया। घबराहट में पसीनो से लबरेज़, मैं चलती बस से उतरा, डॉल म्यूजियम को पार करते हुए , टाइम्स ऑफ़ इंडिया की हेडलाइंस सा बिखरा, "बिहार की जेल में ,कैदी हुए अंधे , हरिजनों का गांव जला कर ऊंचे किये जमींदारों ने अपने कंधे। " हांफता सा में दरयागंज रुका , गोलचा सिनेमा के सामने थोड़ा झुका। हाथ में सिगरेट जलाये वहां सुनील ,खड़ा मुस्कुराये और मुझसे पूछे बिन रहा ना जाये , "करीबन दस साल होगये है , तुम अभी तक बदल  नहीं पाए , वो तुम्हार...

Response poem 1- Translation

Translation of Agha Shahid Ali's Today, talk is cheap, Call somebody.   आज बातें सस्ती है , चलो किसी से बात की जाये - आग़ा शाहिद अली  आज मैंने सुचना विभाग को कॉल लगाया , स्वर्ग में  और पूछा ," क़यामत का दिन कब आएगा ?" और आवाज़ आयी जिस व्यक्ति से आप संपर्क करना  चाह रहे है , उसने आपकी कॉल को होल्ड पर ड़ाल  दिया है, कृपया प्रतीक्षा करें।   उच्च कोटि के देवदूतों की  प्राथनाओ के भजन के बीच,  मैंने दूसरे दूतो की बेकार की चुगली सुन ली , खुद के पंखो को नोचने की अफ़वा  विध्रोह का रूप ले रहा था स्वर्ग में  फिर मैंने सुना आग के शोले जो धुक -धुक करके   दूतों  के पंखो को जला रहे थे    फिर वही प्राथना जो चीखों से होते हुए  मेरे कानो में  पड़ रही थी।   मैंने प्राथना की," प्यार के देवता , कृपया मेरा फ़ोन उठाये। " न जाने लाइन पर मौत के देवता कैसे आगये  मैंने फिर वही सवाल किया ,"बताइये , बताइये मुझे , क़यामत का दिन कब आएगा ?" आखिर कर उन्होंने जवाब दिया ," ईश्वर व्यस्त है। ...

Villanelle Poem: समय मेरा

समय मेरा रेत सा फिसल रहा है  जितनी तेज़ी से पकड़ रही हूँ  उतनी तेज़ी सी निकल रहा हैं  कोशिशे हो रही है दिन पिघल रहा है   रात के उस कोने को  बेपरवाही  से  जकड रही  हूँ  समय मेरा रेत सा फिसल रहा है  भागदौड़ भरे काम को निगल रहा है  नींद भरी अंगड़ाई में सिकुड़ रही हूँ  कितनी तेज़ी से दिन मेरा विफ़ल  रहा है  बेढंगा सा इधर उधर बिखर रहा है  करने को है काम कई  सारे और मैं ठिठक रही हूँ  समय मेरा रेत सा फिसल  रहा है  दुनिया  के  हैं ताने कई  और  समय सबका ठेकेदार  रहा है  लेखन की अंतिम तिथि से बिदक रही हूँ  निर्माण कार्य के उस गुमनाम से मजदूर की  तरह  निष्फ़ल  रहा है  अधूरा इश्क़ हो गया है, ज़ी मिचल रहा है   दिल्ली की सर्दी सी मैं  हो कड़क रही हूँ  समय मेरा रेत सा फिसल रहा  है  फाइव  जी  की स्पीड की तेज़ी सा निकल रहा है 

राजनैतिक सिनेमा

 ट्रैफिक के शोरगुल के  बीच , पैसे कमाने की दौड़ के बीच , ज़िन्दगी की जंग -ए  -मैदान में  लड़ती -बढ़ती , मेट्रो,बस और ट्रैन की धक्का मुक्की के बीच , बेपरवाह बजते उन कानों  मे  इयरफोन्स  के बीच , अपनी मन की धुन सुनना  तो भूल ही गए है , आंख मूँद अपनी साँसों को महसूस करना  तो भूल ही  गए है,  दिन की खबर अख़बार की  सहर , सुनिए ब्रेकिंग न्यूज़ , आज प्रधामंत्री ने क्या कहा मन  की बात मे , सुनिए लेकर प्याला चाय का हाथ में , "भाइयो और बहनो  मैं देश नहीं  मिटने दूंगा , मैं देश नहीं झुकने दूंगा " कहकर जो  जगाते है  वादे  अच्छे दिन के ! अब सुनिए क्या कहता है आम आदमी  अपनी  बात अपने मन मे , रोज़ मिटता है देश  घुट घुट कर , जब होते  है  हमारे  सिपाही  शहीद  आए दिन  आतांकवादी  अटैक का  शिकार  बनकर , रोज़ जलता है ये देश उन बेजुबान नन्ही किलकारियों  में  जो  कुचल दी जाती  है  हवस के गलियारों में , जरा देखिये उन नौजवान पी...

Love Poem : मनमौजी लेख़क

बात लिखता है  जज़्बात  लिखता  है  बेबात लिखता है  गम का चोला  ओढ़  हर बात लिखता है  कहने को कुछ छोड़ा ही कहां  उसने  अब  तो  वो हर दिन अपनी नयी और ताज़ा मोहब्बत की सौग़ात  लिखता है  कहा था  मुझसे की  कभी मोहब्बत  नहीं होगी  अब उसे  की ये बात साल मे  मौसमों  की तरह हर  तिमाही  मे  बिकता  है  ना जाने कैसा  दिल  है  उसका  की  हर  दिल  संभाल  के रखता  है  मुस्कुराना पसंद है उसे  इसलिए  अपने  ग़म  को नई  मुस्कुराहटों में  छुपा  के  रखता है  हम भी रहे थे  मुस्कान  उसके होंठों  की कभी  की आज भी  उस खिलखिलाट  को  वो  ढाँप  के  रखता है  वक़्त  नहीं है कहकर जो टाल  दिया  करता था बातें  आज उसी फुर्सत को  वो  अपनी  क़िताब  में भांप  के लिखता है