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Political poem: Yatish

TL;DR Please read the terms and conditions very carefully before existing I shall use a mobile phone, whose batteries contain cobalt and nickel mined from the fields of Africa by little children who often die inside the mines. I will enjoy the comfort of the clean city in which I reside. Which is cleaned by underpaid sewage workers who do the work manually by going inside the toxic drains and the garbage cleaners who lose their life under the huge dumps of garbage. I shall fulfill my appetite by consuming the food made from grains produced by farmers in distant land, who struggle under distress and crumble under crushing death, who produce the food for my plate but are unable to feed themselves. I shall burst crackers to celebrate festivals and marriage ceremonies, the crackers which are made by laborers in treacherous conditions, who burn their lives to make my world shine. I am liable to write poems and make art and romanticize the miseries of people, I shall seek valid...

Response poem 2: Yatish

(A poem in response to Agha Shahid Ali's A Butcher ) The Blacksmith In this lane Near Jama Masjid I take a stroll, looking for the past interspersed in the bustling streets of Chawri baazar One tries to hear the forgotten sound of the ghungroes of the Tawaifs  in vain. as the streets of the Bazaar-e-Husn now are flooded with new shops and their customers And a tribe of porters moving the mountains of goods across the clutter and chatter brims from the streets Twenty first century is springing up as the old in Delhi slowly Decays As I pass by The vista of utensil shops The roadside tree temple My steps stop by a shop Which harbors  a mosque on its top Red in color known as  lal masjid Red has been smeared On the fate of Delhi Throughout the course of history Red sandstone from Rajasthan The one which is known to all On the walls of lal quila & Jama masjid The khooni darwaz...

Other poem 3: Yatish

मैंने एक कविता लिखनी चाही थी सारी उम्र जिसे तुम पढ़ती रह सकतीं                                                 -पाश मेरे साथ तुम तो नहीं तुम्हारी अनुपस्थिति ज़रूर है तुम्हारे साथ मैं नहीं अगर मेरी कविता तो रह सकती है इसीलिये मैं लिख रहा हूँ एक कविता जिसे तुम ताउम्र  अपने साथ   संभालकर  मेरे एवज में रखना . . . . . . . . . . . वह विलुप्तप्राय भाषा जो हमारे बीच पनपी थी जिसे सारी दुनिया में सिर्फ हम दोनों जानते थे उसके शब्द मेरी अलमारी में इधर-उधर तीतर बीतर बिखरे पड़े हैं कुछ पर तो दीमक लगने लगा है किसी-किसी को चूहों ने कुतर लिया सावन के मधुर गीतों में भी सीलन आ गई है कुछ तो शायद तुम्हारे पास  अब भी रखे होंगे न इससे पहले कि वो सारे शब्द अपने मानी खो बैठे मैं उन्हें समेटकर अपनी कविता में पिरो रहा हूँ . . . .  . . . . . . . . . . . . ...

Response poem 1: Yatish

( a translation to the poem Dacca Gauzes by Agha Shahid Ali) ढाका का मलमल ...साल भर वह सबसे बेहतरीन ढाका के मलमल   इकट्ठा करने की कोशिश में लगा रहा.           -ऑस्कर वाइल्ड, पिक्चर ऑफ़ डोरियन ग्रे ढाका का वो महीन मलमल शाम की ओस; बहता पानी; बुनी हुई हवाओं सा नामोनिशां उस फ़न का बचा नहीं सौ साल हुए उसे लुप्त हुए दादी अक्सर कहती है “एहसास उसको छूने का उसे पहनने का कोई अब क्या जाने” माँ के दहेज़ से विरासत में मिली उन्होंने भी एक बार पहनी थी वो साड़ी जो खालिस साबित हुई तब जब पूरी   की पूरी छह गज एक अँगूठी के भीतर से पार निकल आयी सालों बाद जब साड़ी तार-तार होने लगी उससे बने कई रूमाल जो सजे हुए थे सुनहरे धागे से बनी केरी की आकृतियों से और बंट गए बहुओं और भांजियो में वो भी अब गुम हो चुके हैं इतिहास में हमने पढ़ा था हाथ बुनकरों के कलम कर दिए गए हथकरघा बंगाल के खामोश कर दिए गए अंग्रेजो ने कपास सारा इंग्लैंड की मिलों में भिजवाया इतिहास दादी के ल...

ग़ज़लनुमा Villanelle: Yatish

यादों को तुम्हारी सीने से लगाया था खंजर की तरह आर-पार चली आती हैं यादों को तुम्हारी मैंने अपना बनाया था यादों को तुम्हारी ज़माने से छुपाया था जाने कैसे मेरे चेहरे पे उभर आती हैं यादों को तुम्हारी सीने से लगाया था यादों को तुम्हारी फूलों से सजाया था सूखकर अड़ियल ठूँठ-सी रह जाती हैं यादों को तुम्हारी मैंने अपना बनाया था यादों को तुम्हारी अश्क़ों में बहाया था उमड़-घुमड़ ये फिर से बरस जाती हैं यादों को तुम्हारी सीने से लगाया था यादों का तुम्हारी मैंने इत्र लगाया था खुशबू जिसकी मेरे दिल को रुलाती है यादों को तुम्हारी मैंने अपना बनाया था यादों को तुम्हारी दिल मे बसाया था ये भी क्यूँ मुझे छोड़ कर चली जाती हैं यादों को तुम्हारी सीने से लगाया था यादों को तुम्हारी मैंने अपना बनाया था

City poem: Yatish

देखो तुमको कितना चाहने लगा हूँ मैं दिल्ली की सर्दी में रोज़ नहाने लगा हूँ मैं आँखों से आँसू यक-ब-यक निकल आते हैं मोमो में चटनी तीखी डलवाने लगा हूँ मैं नज़रे ज़माने की मुझपर टिकी रहती है मेट्रो परिसर में संगीत बजाने लगा हूँ मैं रेख्ते के तुम ही उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब' सामने तेरे कूचे के ग़ज़लें सुनाने लगा हूँ मैं कितनी शीरीं है ज़ु बाँ दिल्लीवालों की सरे राह लोगों से  ज़ु बाँ  लड़ाने लगा हूँ मैं मंज़र कबूतरबाजी के अब ग़ुम हैं 'ज़फर' उजड़े दयार   पे तिरे फूल चढ़ाने लगा हूँ मैं आब-ओ-हवा इस शहर की ज़हर-ज़हर है तरीके ख़ुदकुशी के नए आज़माने लगा हूँ मैं ओझल हैं शहर के आसमां से रातों के सितारे छिपकर नीचे छत के टिमटिमाने लगा हूँ मैं घर लौटते हर मोड़ पर बेघर नज़र आते हैं बेबसी में उनसें अपनी नज़रे चुराने लगा हूँ मैं ------------------- यक-ब-यक:  suddenly/ one after another रेख्ते: Rekhta refers to the Hindustani language, the tradition in which poets like Mir, Ghalib, Momin wrote their poetry रेख्ते के तुम ही उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब' कहते हैं किसी ज़माने म...

Ghazal: Yatish

हर पल, हर घड़ी, हर लम्हा तुमको ही याद कर रहें हैं महफ़िल में खोये बैठे हैं बस बार-बार इरशाद कर रहें हैं अंग्रेज़ी हमको आती नहीं हिंदोस्तानी उनको भाती नहीं इश्क़ बयाँ करने को भाषा कोई नई इजाद कर रहे हैं दिलों को ज़ब्त करने की जो मुहिम चलायी है तुमने हुजूम आशिक़ों के ख़िलाफ़ तुम्हारे इंकलाब कर रहें हैं बैचैन-सा नादान ये  मुसलसल जो चलते  रहता है कुछ पल ठहर जाने की वक़्त से फ़रियाद कर रहे हैं इस शोर पसंद ज़माने में ऊँचा ही लोग सुनते हैं टूटे दिलों को सुने कौन जो अनहद नाद कर रहे हैं नफ़रतों के कारोबार में जिन्हें तलाश थी मुनाफ़ों की रुख हवाओं के ख़ुद उनके घरों को आग कर रहे हैं छोड़ने का हमें कहीं अफ़सोस न रहे तुमको सोचकर यही  ख़ुद को बरबाद कर रहे हैं हम 'ख़ाक' न हो जाए कहीं तुम्हे याद करते करते जाओ आज अपने दिल से तुमको आज़ाद कर रहे हैं words: इजाद : invent मुहिम: campaign हुजूम: large group इंकलाब: revolution मुसलसल: continuous अनहद: unbound नाद: sound, Anhad naad is the music which cannot be heard but felt मुनाफ़ा: profits 'ख़ाक':  dust/ ashes/ worthless, ...

Love poem: Yatish

वक़्त ग़र मिले तुम्हे तो कभी खोलना हमारे प्रेम की वह पोटली जो तुमने अपने ह्रदय के किसी अज्ञात, अंधियारे कमरे में छिपाकर रक्खी है ग़र फ़ुरसत हो तो कभी टटोलना वे गीत जो धुनों के धागों में शब्दों को पिरोकर हमने ख़ुद बनाये थे वहीं गीत जो कानों के पीछे तुम्हारी जुल्फों में सजाये थे ज़माने भर के शोर से दूर हमने साथ गाये थे ग़र वक़्त की पगडंडी पर बहुत दूर निकल जाने के बाद तुम्हे कभी फिर मेरी याद आये तो सुनना गौर से इन्हीं गीतों में तुम मुझे खोया पाओगी