City poem: Yatish
देखो तुमको कितना चाहने लगा हूँ मैं दिल्ली की सर्दी में रोज़ नहाने लगा हूँ मैं आँखों से आँसू यक-ब-यक निकल आते हैं मोमो में चटनी तीखी डलवाने लगा हूँ मैं नज़रे ज़माने की मुझपर टिकी रहती है मेट्रो परिसर में संगीत बजाने लगा हूँ मैं रेख्ते के तुम ही उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब' सामने तेरे कूचे के ग़ज़लें सुनाने लगा हूँ मैं कितनी शीरीं है ज़ु बाँ दिल्लीवालों की सरे राह लोगों से ज़ु बाँ लड़ाने लगा हूँ मैं मंज़र कबूतरबाजी के अब ग़ुम हैं 'ज़फर' उजड़े दयार पे तिरे फूल चढ़ाने लगा हूँ मैं आब-ओ-हवा इस शहर की ज़हर-ज़हर है तरीके ख़ुदकुशी के नए आज़माने लगा हूँ मैं ओझल हैं शहर के आसमां से रातों के सितारे छिपकर नीचे छत के टिमटिमाने लगा हूँ मैं घर लौटते हर मोड़ पर बेघर नज़र आते हैं बेबसी में उनसें अपनी नज़रे चुराने लगा हूँ मैं ------------------- यक-ब-यक: suddenly/ one after another रेख्ते: Rekhta refers to the Hindustani language, the tradition in which poets like Mir, Ghalib, Momin wrote their poetry रेख्ते के तुम ही उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब' कहते हैं किसी ज़माने म...